रुद्राक्ष की सम्पूर्ण जानकारी
प्रस्तुत पोस्ट में सभी प्रकार के रुद्राक्षों का वर्णन धारणविधि, मंत्र, विनियोग, रहस्य आदि का विस्तृत विवरण है। रुद्राक्ष की उत्पत्ति
पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार रुद्राक्ष के जन्मदाता स्वयं भगवान् शिव हैं। इसका प्रमाण लिंग पुराण, स्कन्दपुराण, शिव पुराण, अग्नि पुराण आदि ग्रन्थों में मिलता है। रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान् शिव के नेत्र के अश्रुकणों से है। विश्व के सभी देशों व धर्मों के लोग इसकी उपयोगिता स्वीकारते हैं।
भारत में मुख्यतः यह बंगाल एवं असम के जंगलों में तथा हरिद्वार एवं देहरादून के पहाड़ी क्षेत्रों में तथा दक्षिण भारत के नीलगिरी, मैसूर और अन्नामले क्षेत्र में व नेपाल देश के क्षेत्रों में रुद्राक्ष के वृक्ष अधिक पाये जाते हैं। रुद्राक्ष के वृक्ष सामान्य रूप से आम के वृक्षों की तरह होते हैं। आम के पत्तों की तरह इसके पत्ते भी होते हैं।
इसका फूल सफेद रंग का होता है इसके फल हरी आभा युक्त नीले रंग के गोल आकार में आधा इंच से एक इन्च व्यास तक के होते हैं। फल के गुठली पर प्राकृतिक रूप से कुछ धारियां होती हैं और धारियों के बीच का भाग रवेदार होता है। गुठलियों पर आड़ी धारियों से ही रुद्राक्ष के मुखों की गणना की जा सकती है।
रुद्राक्ष के रंग तथा मुख एवं उसमें बने छिद्र प्राकृतिक रूप से होते हैं। ये मुख्यतः चार रंगों में पाये जाते हैं- 1. श्वेत वर्ण 2. रक्त वर्ण 3. पीत वर्ण एवं 4. श्याम वर्ण रुद्राक्ष
रुद्राक्ष के छोटे एवं काले दानों के वृक्ष अधिकांशतः इण्डोनेशिया में पाये जाते हैं तथा नेपाल में भी इसके कुछ वृक्ष हैं। इण्डोनेशिया में विशेषतौर पर 1 मुखी, 2 मुखी और 3 मुखी पाया जाता है। ये रूद्राक्ष नेपाल में बहुत कम पाया जाता है। इसलिए 1 मुखी, 2 मुखी और 3 मुखी नेपाली दाना का मूल्य अधिक होता है।
रुद्राक्ष का महत्व
रुद्राक्ष की नित्य पूजा करने से धारण करने से या विविध रूपों में इसे उपयोग करने से अन्न वस्त्र एवं ऐश्वर्य की कमी नहीं होती तथा शरीर में अनेक रोगों को शमन करने में रुद्राक्ष सहायक होता है। किसी भी रंग या किसी भी क्षेत्र का रुद्राक्ष अनेक सिद्धियों एवं रोगों के उपचार के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।
रुद्राक्ष – पाप वृत्ति से दूर रखता है, हिंसक कार्यों से बचाता है भूत प्रेत एवं ऊपरी बाधाओं से रक्षा तथा पाप कर्मों को नष्ट करके पुण्य का उदय करता है। रुद्राक्ष को धारण करने से बुद्धि का विकास होता है। इस लोक में सुख भोगने के बाद शिव लोक में जाने का अधिकार प्राप्त होता है। रुद्राक्ष धारी व्यक्ति की अल्पमृत्यु नहीं होती एवं रुद्राक्ष दीर्घायु को प्रदान करता है। रुद्राक्ष से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं।
मुख्यतः रुद्राक्ष पन्द्रह प्रकार के पाये जाते हैं। जिसमें प्रथम गौरीशंकर से लेकर चतुर्दशमुखी तक रुद्राक्ष हैं, इसके अनेक प्रकार से लाभ हैं। यूं तो रुद्राक्ष को वैज्ञानिक आधार पर बिना मंत्र का उच्चारण किये भी धारण किया जा सकता है।
किन्तु यदि शास्त्रीय विधि से रुद्राक्ष को अभिमन्त्रित करके धारण किया जाये तो अति उत्तम है। रुद्राक्ष को अभिमन्त्रित करने से उसमें विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है। इसकी विधि यह है कि किसी योग्य पंडित से रुद्राक्ष को अभिमन्त्रित कराया जाये और फिर उपयोग में लाया जाय प्रत्येक रुद्राक्ष का अलग-अलग मंत्र ग्रन्थों में पाया जाता है।
रुद्राक्ष का आधुनिक मूल्यांकन
रुद्राक्ष अनेक रूपों में मानव जीवन के लिए उपयोगी है, इसे भस्म बनाकर उपयोग में लाया जाता तथा जल शोधित किया जाता है, लिंग स्वरूप मान कर भी इसकी पूजा होती है। माला बनाकर गले में धारण की जा सकती है। छोटे दानों को गला, कलाई एवं कमर में भी बांध कर उपयोग में लाया जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जातक के ग्रह प्रतिकूल होने पर रुद्राक्ष की माला धारण करने से ग्रहों का अनुकूल फल प्राप्त होता है। वैज्ञानिक आधार पर आज रुद्राक्ष अपनी कसौटी पर खरा उतर चुका है और लोगों को अनेक तरह से लाभ प्रदान कर रहा है।
रुद्राक्ष के दाने जैसे-जैसे छोटे होते हैं वैसे उनकी कीमत बढ़ती जाती है। जो दाना रुद्राक्ष का बड़ा होता है। उसकी कीमत कम होती है। परन्तु एक मुखी एवं गौरीशंकर रुद्राक्ष का बड़े आकार में अधिक महत्व है तथा कलयुग में काला रुद्राक्ष अत्यधिक उपयोगी एवं लाभकारी माना गया है। इसकी पैदावार मुख्यतः इण्डोनेशिया में होती है।
प्रकार
1. रुद्राक्ष – रुद्राक्ष में प्राकृतिक मुख होता है जो देखने से पता लग जाता है।
2. भद्राक्ष – हिमालय या दक्षिण भारत में उपलब्ध होता है। प्राकृतिक मुख नहीं होता, बनाया जाता है।
3. इन्द्राक्ष लुप्त हो चुका है इसलिए इन्द्राक्ष का नाम सुनने को नहीं मिलता है और न देखने को रुद्राक्ष से लाभ
अगर असली रुद्राक्ष उपयोग में लाया जा रहा है तो यह रक्त चाप, वीर्य दोष, बौद्धिक विकास, मानसिक शान्ति, पारिवारिक एकता, व्यापार में सफलता एवं गुस्से को शान्त करता है। यह ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले लोगों के लिए विशेष उपयोगी होता है। अभक्ष्य भक्षण और परस्त्री गमन जैसे पाप को भी नष्ट करता है । शिक्षक विद्वान सभी के लिए सम्मान कीर्ति प्रदान करता है। इसमें पांचों तत्वों का समावेश है यह अग्निमय, चोरभय एवं दुर्घटनाओं से भी रक्षा करता है।
रुद्राक्षः यस्य गात्रेषु ललाटे च त्रिपुण्ड्रकम् । स चाण्डालोऽपि सम्पूज्यः सर्ववर्णोत्तमो भवेत् ।।
रुद्राक्ष जिसके शरीर पर हो और ललाट पर त्रिपुण्ड हो, वह चाण्डाल भी हो तो सब वर्णों में उत्तम एवं पूजनीय है। अभक्त हो या भक्त हो, नीच हो या नीच से भी नीच हो, जो रुद्राक्ष को धारण करता है, वह सब पातकों से छूट जाता है।
1. एक मुखी रुद्राक्ष – यह रुद्राक्ष साक्षात भगवान शंकर का स्वरूप है। इससे मुक्ति व मुक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। धारक पवित्र व पापमुक्त होकर परम्ब्रह्म की प्राप्ति करता है। यह अत्यन्त दुर्लभ रुद्राक्ष है एवं अनेक कार्यों में सफलता प्रदान करता है।
एकमुखी रुद्राक्ष सर्वसिद्धि प्रदाता रुद्राक्ष कहा गया है। यह सात्त्विक शक्ति में वृद्धि करने वाला मोक्ष प्रदाता रुद्राक्ष है। जिसके घर में यह रुद्राक्ष होता है वहां लक्ष्मी का स्थाई वास हो जाता है तथा उसका घर धन-धान्य, वैभव, प्रतिष्ठा और दैवीय कृपा से भर जाता है। संक्षेप में यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाला चतुवर्ग प्रदाता रुद्राक्ष है।
उपयोग से लाभ –
- जो मनुष्य उच्छिष्ट अथवा अपवित्र रहते हैं अथवा बुरे कर्म करने वाले होते हैं। वे इस रुद्राक्ष को स्पर्श करने से सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।
- इस रुद्राक्ष को कण्ठ में धारण करने वाला महत्त्वाकांक्षी होता है और उसके सभी कार्य सफल होते हैं।
- इसे सिर के ऊपर रखकर स्नान करने से अनेक गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है।
- इस रुद्राक्ष को धारण करने से सभी देवता और देवियां स्वतः ही प्रसन्न हो जाते हैं तथा इच्छित फल प्रदान करते हैं।
- उपयोग मंत्र – ॐ ह्रीं नमः । ॐ नमः शिवाय ।
2. दो मुखी रुद्राक्ष – द्विमुखी रुद्राक्ष शंकर व पार्वती के रूप में माना गया है अर्थात् अर्धनारीश्वर रूप है। इसके उपयोग से धारक के सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। कार्य तथा व्यापार में सफलता मिलती है यह मोक्ष और वैभव का दाता है।
द्विमुखी रुद्राक्ष साक्षात् देवदेवश का स्वरूप है। यह गोवध जैसे पापों से छुड़ाने वाला है। इसको धारण करने वाले व्यक्ति की अनेक व्याधियां स्वतः ही शांत हो जाती हैं। यह रुद्राक्ष भी चतुवर्ग सिद्धि प्रदाता है।
आंवले के फल के बराबर दो मुखी रुद्राक्ष समस्त अनिष्टों का नाश करने वाला तथा श्रेष्ठ माना गया है। इस रुद्राक्ष में पूर्णरूप से अंतर्गर्भित विद्युत तरंगे होती हैं। इन्हीं से इसकी शक्ति का पता चलता है।
दोमुखी रुद्राक्ष के धारण करने से शिवभक्ति बढ़ती है और अनेक रोग नष्ट होते हैं। यह रुद्राक्ष कर्क लग्न वालों के लिए विशेष उपयोगी है।
ज्योतिष में दोमुखी रुद्राक्ष चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। अतः चंद्रमा के कारण उत्पन्न रोगों से मुक्ति के लिए इसे धारण किया जाता है। इसे गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका इत्यादि का प्रतीक मानकर इनके संबंधों की मधुरता व सुदृढ़ता हेतु धारण किया जाता है।
उपयोग से लाभ
- वैदिक ऋषियों का यह मत है कि इसको धारण करने से मन को शांति मिलती है। उसका मुख्य कारण है कि यह शरीर की गर्मी को अपने में खींचकर गर्मी को स्वतः बाहर फेंकता है।
- मसूरिका नामक दुर्दम्य रोग का नाश करने के लिए तीन दिन तक बासी जल के अनुपात से रुद्राक्ष एवं काली मिर्च समभाग एक मासे से तीन मासे तक सेवन कराने से मसूरिका रोग समूल नष्ट हो जाता है।
- उपयोग मंत्र – ॐ नमः । ॐ शिवशक्तिभ्यां नमः ।
3. त्रिमुखी रुद्राक्ष – त्रिमुखी रुद्राक्ष साक्षात् अग्निदेव का स्वरूप है। यह स्त्री हत्या इत्यादि पापों को दूर करने वाला है। इसके धारण से विद्याओं की प्राप्ति होती है। मंदबुद्धि बालकों के लिए इसे धारण करना नितांत आवश्यक है। निम्न रक्तचाप एवं रक्त विकार संबंधी समस्या के निराकरण हेतु इसे पहना जा सकता है।
इसे सात्विक, राजसी और तामसी तीनों शक्तियों का अर्थात ब्रह्मा-विष्णु-महेश का स्वरूप, इच्छा, ज्ञान और क्रिया का शक्तिमय रूप तथा पृथ्वी, आकाश और पाताल क्षेत्रों से संबंधित माना गया है। ज्योतिष में यह रुद्राक्ष मंगल ग्रह द्वारा शासित है।
उपयोग से लाभ
- तीनमुखी रुद्राक्ष के कुछ दाने ताँबे के बर्तन में पानी डालकर भिगोए रखें। प्रत्येक 24 घंटे के अंतराल से यह रुद्राक्ष जल खाली पेट प्रातः पीने से विभिन्न चर्म रोगों के निदान में सहायता प्राप्त होती है।
- तीन मुखी रुद्राक्ष की माला द्वारा जप करने से यश प्राप्त होता है एवं कामनायें सिद्ध होती हैं।
- जो मनुष्य उच्छिष्ट अथवा अपवित्र रहते हैं अथवा बुरे कर्म करने वाले होते हैं। वे इस रुद्राक्ष के धारण से सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।
- उपयोग मंत्र – ॐ क्लीं नमः । ॐ अग्नये नमः ।
4. चारमुखी रुद्राक्ष – यह ब्रह्मा जी का स्वरूप माना गया है यह चारों वेदों का द्योतक है। मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्रदान करने वाला है। इसे धारण करने से मानसिक रोग दूर होते हैं तथा मन में सात्विक विचार उत्पन्न होते हैं एवं धर्म में आस्था बढ़ती है।
यह अभीष्ट सिद्धियों को देने वाला परम गुणकारी रुद्राक्ष है। अनुकूल विद्या को प्राप्त करने में इससे सहायता मिलती है तथा सद्गुरु की प्राप्ति होती है।
यह रुद्राक्ष धनु और मीन लग्न के जातकों के लिए अत्यन्त लाभकारी माना गाया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चारमुखी रुद्राक्ष बुध ग्रह द्वारा शासित है। इसे धारण करने से जातक की बुद्धि का विकास होता है, स्नायु एवं मानसिक रोग का नाश होता है।
उपयोग से लाभ
- यह रुद्राक्ष डा. इंजीनियर, अध्यापक आदि को भौतिक कार्य करने में सहायता प्रदान करता है।
- इसको धारण करने से व्यर्थ की चिंता नष्ट होती है तथा यह धर्म की ओर अग्रसर करता है और सफलता देता है।
- उदर तथा गर्भाशय से रक्तचाप तथा हृदय रोग से सम्बन्धित अनेक बिमारियों के लिए चारमुखी रुद्राक्ष के कुछ दाने मिट्टी की हाँडी में पानी डालकर भिगोये रखें प्रत्येक 24 घंटे पश्चात यह रुद्राक्ष का जल खाली पेट प्रातः काल पीने से अवश्य लाभ होगा।
- उपयोग मंत्र ॐ ह्रीं नमः । ॐ ब्रह्मणे नमः ।
5. पंचमुखी रुद्राक्ष – यह पंचमुखी रुद्राक्ष कालग्नि रुद्र का स्वरूप है इसके देवता कालाग्नि और दारिद्र नष्ट होता है। पुण्य का उदय होता है शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है एवं यह पाप का नाशक है। यह पंच- ब्रह्मा का स्वरूप और पंचतत्वों का प्रतीक भी है। यह दुख दारिद्र्यनाशक, स्वास्थ्यवर्धक, आयुष्यवर्धक, सर्वकल्याणकारी, मंगलप्रदाता, पुण्यदायक एवं अभीष्ट सिद्धिप्रदायक है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। जंघा व लीवर की बीमारियों से मुक्ति और बृहस्पति के कारण उत्पन्न कष्टों व अरिष्ट के निवारणार्थ इसे धारण किया जाता है।
पर स्त्री गमन करने से जो पाप बनता है तथा अभक्ष्य भक्षण करने से जो पाप लगता है वह सब पंचमुखी रुद्राक्ष के धारण करने से नष्ट हो जाते हैं। इसमें कोई संशय नहीं, यह पंचतत्त्वों का प्रतीक है।
यह सर्वकल्याणकारी, मंगलप्रदाता एवं आयुष्यवर्द्धक है। महामृत्युंजय इत्यादि अनुष्ठानों में इसका ही प्रयोग होता है। यह अभीष्ट सिद्धि प्रदाता है। सर्वत्र सहज सुलभ होने के कारण इसका महत्व अत्यधिक है परंतु शास्त्रीय दृष्टि से भी इसका महत्त्व कम नहीं है।
उपयोग से लाभ
- पंचमुखी रुद्राक्ष की माला पर महामृत्युंजय का जप एवं गायत्री जप शीघ्र सिद्धि प्रदान करता है 1
- पंचमुखी रुद्राक्ष की माला पर ॐ नमः शिवाय का नित्य एक माला जप करने से मंत्र शीघ्र सिद्ध हो जाता है तथा इस मंत्र द्वारा किसी भी कार्य पूर्ति के लिए सफलता पायी जा सकती है।
- पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करने से अभक्ष्य भक्षण और पर स्त्री गमन जैसे जघन्य अपराध भी भगवान शिव द्वारा नष्ट होता है।
- उपयोग मंत्र – ॐ ह्रीं नमः । ॐ नमः शिवाय ।
6. छ: मुखी रुद्राक्ष – यह भगवान षडानन का स्वरूप है, इसके देवता भगवान कार्तिकेय हैं इससे धारक की सोई हुई शक्ति जाग्रत होती हैं। यह विद्या प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ है तथा आत्मशक्ति संकल्प शक्ति और ज्ञान शक्ति प्रदान करता है।
यह छह प्रकार के दोषों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) को दूर करने वाला है।
ज्योतिष के अनुसार छहमुखी रुद्राक्ष शुक्र ग्रह द्वारा शासित है। दाम्पत्य जीवन की सफलता एवं परस्पर प्रेम, काम-शक्ति में वृद्धि तथा शुक्र जनित रोगों से मुक्ति हेतु इसे धारण किया जाता है। इसे धारण करने से अनेक प्रकार के चर्म रोग, हृदय रोग तथा नेत्र रोग दूर होते हैं।
इस रुद्राक्ष को जो मनुष्य अपनी दक्षिण भुजा में धारण करते हैं, वे भ्रूणहत्या आदि से लेकर बड़े पापों से छूट जाते हैं। इसमें कुछ संशय नहीं है। गुप्त शत्रु एवं प्रकट शत्रु नष्ट करने हेतु इस रुद्राक्ष का बड़ा भारी महत्त्व है इसलिए कुछ विद्वान इसे ‘शत्रुंजय रुद्राक्ष’ भी कहते हैं। छःमुखी रुद्राक्ष वृष लग्न के जातक को अत्यधिक लाभ प्रदान करता है ।
उपयोग से लाभ
- छः मुखी रुद्राक्ष की माला जप करने से विपत्ति से छुटकारा मिलता है एवं पीड़ायें नष्ट होती हैं।
- बड़े आकार का दाहिनी भुजा पर (पुरुष) धारण करने से बड़े से बड़ा अपराध का पाप नष्ट होता है।
- छः मुखी रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य की सोयी हुई शक्तियां जागृत होती हैं स्मरण शक्ति प्रबल होती है और बुद्धि तीव्र होती है। यह रुद्राक्ष आत्मशक्ति, संकल्पशक्ति और ज्ञानशक्ति का दाता है।
- उपयोग मंत्र – ॐ ह्रीं हूं नमः ॐ षडाननाय नमः ।
7. सातमुखी रुद्राक्ष – इसके देवता सप्तऋषि हैं इससे लक्ष्मी प्राप्ति होती है तथा धन-संपत्ति, कीर्ति प्राप्त होती है।
सोने की चोरी की है, गोवध किए हैं अथवा अनेक प्रकार के सैकड़ों पाप किए हैं उनको यह पवित्र बना देता है। यह रुद्राक्ष पाप नाशक एवं भूमि प्रदाता है।
प्राचीन काल में ऋषियों को यह अत्यन्त प्रिय था और ऋषिगण प्रायः इसका उपयोग अत्यधिक किया करते थे। यह रुद्राक्ष वृष, कन्या, कुम्भ लग्न के जातक को अत्यन्त लाभ प्रदान करता है।
ज्योतिष के अनुसार सातमुखी रुद्राक्ष शनि द्वारा शासित है। इसे धारण करने से शनि ग्रह के दोषों का नाश होता है. जातक को आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है सातमुखी रुद्राक्ष वात रोगों एवं मृत्यु तुल्य कष्टों से छुटकारा दिलाता है।
उपयोग से लाभ
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- यह रुद्राक्ष धनागमन एवं व्यापार उन्नति में अत्यन्त सहायक माना गया है।
- सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से दाम्पत्य सुख की वृद्धि होती है तथा पौरुष को बढ़ाता है।
- सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से पति-पत्नी के मध्य परस्पर सहयोग एवं सम्मान तथा प्रेम की वृद्धि होती है।
- उपयोग मंत्र – ॐ हूं नमः । ॐ अनन्ताय नमः ।
8. आठमुखी रुद्राक्ष – अष्टमुखी रुद्राक्ष को विनायक का रूप माना गया है इससे धारक की विघ्न बाधाएं दूर होती हैं। आठों दिशाओं में विजय प्राप्त होती है व कोर्ट कचहरी के मामलों में सफलता मिलती है।

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
अष्टमुखी रुद्राक्ष साक्षात् गणेशजी का स्वरूप है तथा यह अष्टसिद्धि प्रदाता है। मानकूटादिक और परस्त्रीजन्य जो पाप हैं वे अष्टमुखी रुद्राक्ष धारण करने से नष्ट होते हैं। गणेश विषयक अनुष्ठानों में शीघ्र सफलता प्रदान करता है।
यह रुद्राक्ष मीन लग्न के जातकों के लिए अत्यन्त लाभकारी माना गया है। भगवान गणेश की कृपा प्राप्ति हेतु असाध्य रोगों के निवारण हेतु एवं राहु ग्रह के दोषों के शमन हेतु इसे धारण किया जाता है।
उपयोग से लाभ
- इस रुद्राक्ष की माला पर जप करने से गणेश की सिद्धि शीघ्र ही प्राप्त होती है तथा आठों दिशाओं में विजय पताका लहराता है।
- इस रुद्राक्ष के धारण करने से कोर्ट कचहरी के मामलों में सफलता मिलती है साथ ही दुर्घटनाओं एवं प्रबल शत्रुओं से रक्षा होती है तथा भूत, प्रेत, जिन्न, पिशाच आदि बाधाओं से रक्षा होती है
- यह रुद्राक्ष धारण करने से दुष्ट स्त्री से किये गये सहवास का पाप नष्ट होता है।
- उपयोग मंत्र – ॐ हूं नमः । ॐ श्री महागणाधिपतये नमः ।
9. नौमुखी रुद्राक्ष – यह रुद्राक्ष नवशक्ति से संपन्न है इसकी इष्ट देवी भगवती दुर्गा हैं इससे धारक को चारों धाम व समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होता है इसे धर्मराज का स्वरूप माना गया है। इसेधारण करने से वीरता, साहस और कर्मठता में वृद्धि होती है। इसे आकस्मिक घटनाओं से बचाव तथा अशुभ केतु से संबंधित दोषों की शांति हेतु धारण किया जाता है।
नौमुखी रुद्राक्ष का भैरव नाम है, कपिलवर्ण है जो मनुष्य अपनी वाम भुजा में इसको धारण करते हैं वे भैरव तुल्य हो जाते हैं वस्तुतः ‘भैरवनामक’ नवमुखी रुद्राक्ष नव प्रकार की निधियों का प्रदाता है। यह सभी अभीष्ट वस्तुओं का प्रदाता है। नवदुर्गा, नवग्रह, नव-नाथों एवं नवधा भक्ति का प्रतीत है। यह सभी अभिलषित वस्तुओं का प्रदाता है। कन्या लग्न वाले के लिए श्रेयष्कर है।

उपयोग से लाभ
- नौमुखी रुद्राक्ष धारण करने से तांत्रिक सिद्धियां शीघ्र प्राप्त होती हैं तथा तंत्र क्षेत्र का ज्ञान बढ़ता है।
- नौमुखी रुद्राक्ष को बांयी भुजा पर धारण करने से व्यक्ति को भैरवसिद्धि प्राप्त होती है तथा वह व्यक्ति तन, मन से सदा पवित्र रहता है।
- नौमुखी रुद्राक्ष की माला पर नवरात्रि में नवार्णमंत्र का जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है एवं मां भगवती की कृपा प्राप्त होती है।
- उपयोग मंत्र ॐ महाभैरवाय नमः । ॐ ह्रीं हूं नमः ।
10. दशमुखी रुद्राक्ष – यह भगवान विष्णु का स्वरूप है इसके देवता भगवान विष्णु हैं इससे सर्व ग्रहशांत होते हैं ग्रह बाधा के कारण यदि भाग्य साथ न दे तो अवश्य धारण करें यह धारक को बेताल, पिशाच, ब्रह्म, राक्षस आदि के भय से निर्भयता प्रदान करता है।
दशमुखी रुद्राक्ष साक्षात् जनार्दन अर्थात् विष्णु का स्वरूप है दशमुखी रुद्राक्ष के धारण करने से मनुष्य के सर्व ग्रह शांत रहते हैं और पिशाच, बेताल, ब्रह्म, राक्षस, सर्प इत्यादि का भय नहीं होता। यह रुद्राक्ष सभी प्रकार की बाधाओं का नाश कर, सुख, शांति व समृद्धि का प्रदाता है। यह रुद्राक्ष मिथुन एवं कन्या लग्न के जातकों के लिए अत्यधिक लाभकारी माना गया है।
उपयोग से लाभ
- दशमुखी रुद्राक्ष धारण करने से लौकिक एवं परलौकिक कामनायें पूर्ण होती हैं तथा सामाजिक कीर्ति एवं सम्मान प्राप्त होता है।
- दशमुखी रुद्राक्ष धारण करने से दशों इन्द्रियों से किया गया पाप नष्ट होता है तथा पुण्य का उदय होता है। दशमुखी रुद्राक्ष समाजसेवक, वकील, नेता, कलाकार, कवि, लेखक कृषक आदि के लिए धारण करना लाभदायक माना गया है।
- उपयोग मंत्र – ॐ नमो नारायणाय ॐ ह्रीं हूं नमः ।
11. एकादशमुखी रुद्राक्ष – ग्यारहमुखी रुद्राक्ष साक्षात रुद्र है। यह 11 रुद्रों एवं भगवान शंकर के ग्यारहवें अवतार संकटमोचन महावीर बजरंगबली का प्रतीक है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति को सांसारिक ऐश्वर्य और संतान सुख प्राप्त होता है और उसके सारे संकट दूर हो जाते हैं।
एकादशमुखी रुद्राक्ष एकादश रुद्रों का ही स्वरूप है। इस रुद्राक्ष को साक्षात् शिव का प्रसाद समझकर जो व्यक्ति गले में धारण करके या शिखा स्थान में बांधकर रखते हैं उनको हजार अश्वमेध यज्ञ करने का फल, सौ वाजपेय यज्ञ करने का फल और ग्रहण में दान करने से जो फल प्राप्त होता है वह फल इस रुद्राक्ष को विधिवत पूजन कर धारण करने से होता है।
यह रुद्राक्ष वृश्चिक लग्न वाले जातकों के लिए धारण करना शुभ फलकारक होता है।
उपयोग से लाभ
- ग्यारह मुखी रुद्राक्ष एकादशी में गले या सिर पर धारण करने से विष्णु भगवान प्रसन्न होते हैं और अश्वमेघ यज्ञ का फल प्रदान करते हैं।
- वन्ध्या स्त्री को विश्वास पूर्वक धारण करने पर सन्तानवती होने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
- मस्तिष्क सम्बन्धी विकारों से पीड़ित व मस्तिष्कीय कार्य करने वाले लोगों को शक्ति प्राप्त होती है।
- उपयोग मंत्र – ॐ ह्रीं हूं नमः । ॐ सर्वेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः ।
12. बारहमुखी रुद्राक्ष – द्वादशमुखी रुद्राक्ष को कान में धारण करने से बारहों आदित्य देव प्रसन्न होते हैं। उसे शस्त्रधारी लोगों, सींग वाले जानवरों और बाघ आदि का भय नहीं होता, न ही आधि-व्याधि का भय होता है।
इसे आदित्य रुद्राक्ष के नाम से भी जाना जाता है। इसे धारण करने से बाधाओं और सूर्य के कारण उत्पन्न रोगों से बचाव होता है।
यह भगवान विष्णु का स्वरूप है इसके देवता बारह सूर्य हैं। इसके धारण करने से दोनों लोकों में सुख की प्राप्ति होकर सदा भरण पोषण होता है गो हत्या मनुष्य हत्या व रत्नों की चोरी जैसे पाप इसके उपयोग से नष्ट होते हैं।
द्वादशमुखी रुद्राक्ष धारण करने से सभी पाप नाश हो जाते हैं क्योंकि सूर्य आदि से लेकर संपूर्ण आदित्य द्वादशमुखी रुद्राक्ष में वास करते हैं। इस लिए उन मनुष्यों को चोर, अग्नि का भय तथा अनेक प्रकार की व्याधि नहीं होती और वे अर्थवान होते हैं यदि दरिद्र भी हों तब भी भाग्यवान हो जाते हैं।
इस रुद्राक्ष को दांतों की संख्या के बराबर अर्थात् (32) की माला कण्ठ में धारण करने पर गो-वध मनुष्य हत्या एवं चोरी कार्य का पाप नष्ट हो जाता है। यह सब प्रकार की बाधाओं का कीलन करने वाला ‘आदित्यरुद्राक्ष’ नाम से जाना जाता है।
उपयोग से लाभ
- यह रुद्राक्ष दरिद्रता को नष्ट करता है सभी प्रकार के भयानक पशुओं से रक्षा करता है।
- इस रुद्राक्ष को दांतों की संख्या के बराबर की माला कंठ में धारण करने से गो-वध, मनुष्य एवं चोरी जैसे पाप को नष्ट करता है।
- द्वादशमुखी रुद्राक्ष धारण करने से सभी प्रकार की बाधायें नष्ट होती हैं मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा से छुटकारा मिलता है।
- उपयोग मंत्र – ॐ क्रौं क्षौं रें नमः । ॐ द्वादशादित्येभ्यो नमः ।
13. तेरहमुखी रुद्राक्ष – यह संपूर्ण कामनाओं एवं सिद्धियों को देने वाला है। निःसंतान वाले को संतान प्रदान करता है तथा सभी कार्यों में सफलता प्रदान करता है।
त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष साक्षात् इंद्र का स्वरूप है जो मनुष्य त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष को धारण करते हैं उनकी संपूर्ण मनोकामना सिद्ध होती है तथा वे अतुल संपत्ति के मालिक होते हुए भाग्यवान होते हैं।
इसको धारण करने वाला व्यक्ति संपूर्ण धातुओं की रसायनिक सिद्धि का ज्ञाता हो जाता है। यह रुद्राक्ष तुला लग्न वाले जातकों के लिए धारण करना शुभकारक होता है।
उपयोग से लाभ
- तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सभी प्रकार की धातुओं एवं रसायन आदि की सिद्धि का ज्ञाता होता है।
- यह रुद्राक्ष धारण करने से विश्वदेव प्रसन्न होते हैं तथा करोड़ो महापातक नष्ट हो जाते हैं।
- तेरहमुखी रुद्राक्ष, औषधि-विज्ञान, रसायन क्षेत्र, धातु कार्य आदि से जुड़े हुये व्यापारियों को धन एवं वैभव प्रदान करता है।
- उपयोग मंत्र – ॐ ह्रीं नमो नमः ॐ इन्द्राय नमः ।
14. चौदहमुखी रुद्राक्ष – यह हनुमान जी का स्वरूप है। यह चौदह विद्या, चौदह लोक, चौदह मनु का साक्षात् रूप है। इसे धारण करने से सभी पापों से छुटकारा मिलता है व समस्त व्याधियां शांत हो जाती है तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है।
चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष हनुमान का स्वरूप है जो मनुष्य नित्य प्रति इसे धारण करते हैं वो परम पद को प्राप्त होते हैं। इस रुद्राक्ष के पहनने से शनि मंगल दोष की शांति होती है तथा दुष्टजनों का नाश होता है। यह ‘हनुमान रुद्राक्ष’ नाम से प्रसिद्ध है तथा सकल अभीष्ट सिद्धियों का दाता है।
यह रुद्राक्ष मेष और मकर लग्न वाले जातकों के लिए लाभकारी होती है। जो मनुष्य पृथ्वी पर रुद्राक्ष को मंत्र सहित धारण करते हैं वे रुद्रलोक में जाकर वास करते हैं।
उपयोग से लाभ
- चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण करके हनुमान जी की उपासना करने पर परमपद की प्राप्ति होती है व भक्ति प्राप्ति होती है।
- यह रुद्राक्ष धारण करने से शनि और मंगल की शान्ति होती है तथा दुष्ट शत्रुओं का नाश होता है।
- इस रुद्राक्ष की माला पर भगवान पुरुषोत्तम के मंत्रों का जप करने से वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है तथा सदाचार भावना उत्पन्न होती है।
- उपयोग मंत्र – ॐ हनुमते नमः । ॐ नमः ।
15. पंद्रहमुखी रुद्राक्ष – यह रुद्राक्ष भगवान पशुपतिनाथ का स्वरूप माना जाता है यह अल्प समय में ही शिव जी का सान्निध्य प्रदान करने वाला है। इसके प्रभाव से धारक सभी प्रकार के संकटों से मुक्त रहता है। हानि, दुर्घटना रोग व चिंता से मुक्त रखकर धारक की सुरक्षा, समृद्धि इसका विशेष गुण है।
यह भूत-प्रेत, बुरी नजर, जादू-टोना, काला जादू इत्यादि से धारक की सदैव रक्षा करता है। यह धारक को सदैव सभी प्रकार की परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। इस रुद्राक्ष को धारण करने वाला अनंत जन्मों के पापों से मुक्त होकर अंत समय में मोक्ष को प्राप्त करता है।
यह धारक को आर्थिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर उठाकर उसे सुख, संपदा, मान–सम्मान-प्रतिष्ठा एवं शांति प्रदान करता है। यदि कोई गर्भवती स्त्री इसे धारण करे तो उसके गर्भपात का भय नहीं रहता और प्रसव पीड़ा में कमी होती है।
16. सोलहमुखी रुद्राक्ष – सोलहमुखी रुद्राक्ष को हरि शंकर अर्थात विष्णु और शिव का रूप माना गया है। पक्षाघात (लकवा), सूजन, कंठादि रोगों में इसे धारण करना लाभदायक होता है। इसके अतिरिक्त आग, चोरी, डकैती आदि का भय नहीं रहता है।
17. सत्रहमुखी रुद्राक्ष – सत्रहमुखी रुद्राक्ष को सीता राम का स्वरूप कहा गया है। कई विद्वान विश्वकर्मा को इसका प्रधान देवता मानते हैं। इसे धारण करने से भूमि मकान, वाहनादि का सुख और अनचाहे धन, समृद्धि और सफलता का लाभ प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त याददाश्त में वृद्धि होती है तथा, आलसीपन और कार्य करने के प्रति अनिच्छा दोनों दूर होते हैं।
18. अठारहमुखी रुद्राक्ष – अठारहमुखी रुद्राक्ष को भैरव का रूप माना गया है। इसे धारण करने से शरीर पर आने वाली विभिन्न विपदाओं (यथा आकस्मिक दुर्घटना आदि) का नाश होता है, व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। यदि कोई गर्भवती स्त्री इसे धारण करे तो उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की रक्षा होती है।
19. उन्नीसमुखी रुद्राक्ष – उन्नीसमुखी रुद्राक्ष को भगवान नारायण का स्वरूप कहा गया है। इसे धारण करने से मनुष्य सत्य एवं न्याय के पथ पर अग्रसर होता है। उसे आर्थिक सुख-संपदा का लाभ मिलता है, और रक्त व स्नायु तंत्र से संबंधित रोगों से उसकी रक्षा होती है।
20. बीसमुखी रुद्राक्ष – बीसमुखी रुद्राक्ष को जनार्दन स्वरूप कहा गया है। इसे धारण करने से भूत, पिशाच आदि का भय नहीं रहता साथ ही क्रूर ग्रहों का अशुभ प्रभाव भी नहीं पड़ता है। वह श्रद्धा एवं तंत्र विद्या के जरिए विशेष सफलता प्राप्त करता है। उसे सर्पादि विषधारी प्राणियों का भय नहीं होता है।
21. इक्कीसमुखी रुद्राक्ष – इक्कीसमुखी रुद्राक्ष साक्षात शिव स्वरूप है। इसमें सभी देवताओं का वास माना गया है। इसे धारण करने से स्वास्थ्य आर्थिक दृष्टि से व्यक्ति सुखी रहता है। यह रुद्राक्ष व्यक्ति के भीतर आज्ञा चक्र कुंडलिनी को जाग्रत करता है।
22. गौरीशंकर रुद्राक्ष – प्राकृतिक रूप से आपस में जुड़े गौरी-शंकर रुद्राक्ष को शिव-पार्वती के समान अपार शक्ति वाला शिव-शक्ति का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से शिव और शक्ति अर्थात माता पार्वती की कृपा समान रूप से प्राप्त होती है। इसे धारण करने से पति-पत्नी के आपसी प्रेम में वृद्धि होती है और उनका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। स्वास्थ्य अनुकूल रहता है, आयु में वृद्धि होती है तथा प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होती है।
साथ ही यह काम संबंधी समस्याओं को दूर करने में भी लाभदायक होता है। घर पूजा गृह अथवा तिजोरी में मंगल कामना सिद्धि के लिए रखना लाभदायक है। इसे उपयोग में लाने से परिवार में सुख-शांति की वृद्धि होती है वातावरण शुद्ध बना रहता है। गले में धारण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
गौरीशंकर रुद्राक्ष सर्वसिद्धि प्रदाता रुद्राक्ष कहा गया है। यह सात्त्विक शक्ति में वृद्धि करने वाला मोक्ष प्रदाता रुद्राक्ष है। जिसके घर में यह रुद्राक्ष होता है वहां लक्ष्मी का स्थाई वास हो जाता है तथा उसका घर धन-धान्य, वैभव, प्रतिष्ठा और दैवीय कृपा से भर जाता है। संक्षेप में यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाला चतुवर्ग प्रदाता रुद्राक्ष है।
गौरीशंकर रुद्राक्ष सभी लग्न के जातकों के लिए शुभ माना गया है।
उपयोग से लाभ
- इसे धारण करने से गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी के मध्य प्रेम तथा विशेष सुख शान्ति प्राप्त होती है। यह रुद्राक्ष धनागमन एवं व्यापार उन्नति में अत्यन्त सहायक माना गया है।
- गौरीशंकर रुद्राक्ष धारण करने से पुरुषों को स्त्री सुख प्राप्त होता है तथा परस्पर सहयोग एवं सम्मान तथा प्रेम में वृद्धि होती है।
- यह रुद्राक्ष शिवभक्ति के लिए अधिक उपयोगी माना गया है, भगवान शिव और मां शक्ति इस रुद्राक्ष में निवास करते हैं।
- गौरीशंकर का मंत्र – ॐ गौरीशंकराभ्यां नमः ।
23. गणेश रुद्राक्ष – जिस रुद्राक्ष पर गणेश जी की सूंड के समान अलग से एक धारी उठी हुई दिखाई दे, उसे गणेश रुद्राक्ष कहा जाता है। इसे धारण करने से व्यक्ति को ऋद्धि-सिद्धि कार्यकुशलता, मान-प्रतिष्ठा, व्यापार में लाभ इत्यादि की प्राप्ति होती है।
यह विद्यार्थी वर्ग के लिए विशेष लाभदायक है, जिसे धारण करने से विद्यार्थी की स्मरणशक्ति एवं ज्ञान में वृद्धि होती है, उसका बौद्धिक विकास होता है, और परीक्षा में अच्छे अंकों से सफलता प्राप्त होती है।
मंत्र ॐ श्री गणेशाय नमः ।
24. गौरी गणेश रुद्राक्ष – यह माता पार्वती और गणपति का प्रतीक है। इसे श्रेष्ठ संतान प्राप्ति की इच्छा से धारण किया जाता है। इसके धारण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और संतान से प्रेम और सहानुभूति में वृद्धि होती है। इसके लिए निम्नांकित मंत्र का जप करें-
मंत्र ॐ ह्रीं ग्रीं ह्रीं ।
निर्देश
प्रत्येक रुद्राक्ष में अंतर्गर्भित विद्युत तरंगे होती हैं तथा इन अंतर्गर्भित विद्युत तरंगों शक्ति का पता उसकी धारियों की संख्या के अनुसार चलता है। अलग-अलग मुख अलग-अलग परिणाम को देने वाले होते हैं तथा उनको एक विशिष्ट नाम से भी संबोधित किया जाता है।
रुद्राक्ष सामान्यतः इक्कीस मुख तक पाए जाते हैं परंतु पंद्रह से इक्कीस मुख के दाने प्रायः दुर्लभ होते हैं। कुछ चालाक व्यक्ति दो रुद्राक्षों को काटकर सफाई से वापस जोड़कर उनके कई मुख बना देते हैं इसी प्रकार से कई लोग गौरीशंकर रुद्राक्ष भी बना डालते हैं। शास्त्रकारों ने चौदह मुख तक के रुद्राक्ष का ही वर्णन किया है।
सभी रुद्राक्षों की पूजन एवं धारण विधि
यथाशक्ति अनुसार किसी की रुद्राक्ष को सोने में या चांदी में मड़वाकर या बिना मड़वाये, सोमवार अथवा बृहस्पतिवार एवं महाशिवरात्रि आदि पर्व दिनों में सोने की जंजीर (चेन) अथवा चांदी की जंजीर या केवल लाल या काले धागे में धारण कर सकते हैं।
प्रातः काल के समय रुद्राक्ष को पवित्र अवस्था में गंगाजल तथा कच्चे दूध से धोकर चंदन का लेप करके धूप एवं दीप से पूजन करके, पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय की एक माला जप करके पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके श्रद्धा-विश्वास पूर्वक धारण करें।
विशेष यदि कोई साधक इन रुद्राक्षों के विशिष्ट मंत्रों का जप करना चाहे तो रुद्राक्ष धारण करने से पूर्व अपनी सुविधा अनुसार किसी भी मंत्र का जप कर सकते हैं।
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